Thursday, August 5, 2010

Meri Premika

आज मैं अपनी प्रथम कविता प्रकाशित कर रहा हूँ | यह कविता मेरे कलम से उस समय उदघृत हुई थी जब मै अवसाद की स्तिथि से गुजर रहा था | वर्ष २००४ में किन्ही वजहों से मुझे अपनी अध्ययन को विराम देना पड़ा, ऐसे परिस्थिति में मै अवसाद का शिकार हो गया | मैंने साहित्य का मार्ग चुना और शीर्षक "मेरी प्रेमिका" नामक प्रथम कविता लिखी.  


"मेरी प्रेमिका"

आइये आज आप को कुछ बतलाता हूँ, 
आपको अपने जीवन की अविस्मरणीय घटना से अवगत कराता हूँ |

मेरा सुख और सुन्दर काया किसी को भा गई,
वह स्वयं को मेरी प्रेमिका बतला, मेरे ह्रदय में नही बल्कि मेरे मस्तिष्क के कोने में समां गई |

अब ना रातों को नीद ना दिन में भी चैन,
हर वक़्त रहता हूँ ग़मगीन, हर वक़्त बेचैन |


हंसना और गुनगुनाना पूर्ण रूपेण भूल गया,
इस कदर हुआ नकारा कि स्वयं के अस्तित्व को भी भूल गया |

यदि किसी महफ़िल और किसी भीड़ में भी जाता हूँ,
ना जाने क्यों स्वयं को अकेला ही खड़ा पाता हूँ |

तन्हाई का ये आलम था कि मित्र भी दूर रहने लगे,
स्वास्थ ने भी जबाब दे दिया और अलविदा कहने लगे |

बड़े दिनों के बाद इच्छा हुई की आईना देख लूँ ,
स्वयं पर गौर से एक नजर तो फेर लूँ |

आईना देख मै पूर्ण रूप से घबरा गया ,
आँखों तले मेरे अँधेरा छा गया |

मेरा चेहरा पूरी तरह से बदल गया है ,
मानो यौवन  पर ग्रहण सा लग गया है |

मेरा सुख , मेरी सुन्दरता , मेरा लक्ष्य,
सब कुछ मुझसे छिन गया है |

अब मै बन गया हूँ पर्याय 'विनाश' का,
मेरे विनाश का कारण कोई और नही बल्कि है मेरी ही "प्रेमिका"
जी हाँ दोस्तों आप भी जान लीजिये चिंता है मेरी "प्रेमिका" |

"दीपक"

 
 

Tuesday, June 8, 2010

Armaan

"अरमान"
राह में उनकी हम अपने आँखें बिछाये बैठे हैं |
किसी संग दिल से हम मोहब्बत की आस लगाये बैठे हैं |
कोई तो संभालों इस दीवाने को ऐ यारों |
मोहब्बत की आग में हम अपना हाथ जलाये बैठे हैं || १ ||


जाने कैसे फंस गए हम इस इश्क के भंवर में |
तूफानी दरिया में हम चिराग जलाये बैठे हैं || २ ||

उन्हें इल्म भी नही है हमारे इस फसाने की |
हम उस बेमुर्रौवत से मोहब्बत की आस लगाये बैठे हैं || ३ ||

वो सोए है बेफिक्री की चादर में  ऐ 'जालिम'
हम उनके खाबों में अपने अरमान लुटाये बैठे है || ४ ||

"दीपक"







 

Monday, March 29, 2010

"प्रेम"
प्रेम एक रंग है, उमंग है, तरंग है,
कि प्रेम से ह्रदय में एक दीप जगमगाती है |
प्रेम से ही गीत बने, प्रेम से ही मीत बने, 
प्रेम से ही जीवन में प्रकाश चली आती है |
प्रेम में ना भूख लगे, प्रेम में ना प्यास लगे,
प्रेम हो तो अंखियो में नींद नही आती है |
और प्रेम हो तो मीरा जैसी कृष्ण की दीवानी बने,
रात-दिन प्रेम के ही गीत गुनगुनाती है |  


 




"दीपक"         

Friday, March 5, 2010

"हसरत "

ठहरो जरा थोडा सा इंतजार तो कर लो ,
मेरे  जितना खुद को बेक़रार तो कर लो  || १ ||  

यकीन न आयें मोहब्बत पे मेरी तो कोई बात नही ,
झूठा ही सही इस दीवाने पे ऐतबार तो कर लो  || २ ||

उठ रही है महफ़िल में हर नजर तेरी ओर,
दीद-ऐ -हसरत की तरफ नजर एक बार तो कर लो  || ३ ||


कौन जाने ये मुलाकात फिर हो ना हो,
आओ बैठो चंद हमसे कुछ बात तो कर लो || ४ ||


होता है दुवाओं में असर ये तो सच है,
हसरते पूरी होने की फ़रियाद तो कर लो || ५ ||


"दीपक"

Sunday, January 31, 2010

""अभी बाकी है"


जिंदगी में देने अभी इम्तहान बहुत बाकी है।
निकले जो दिल से वो अरमान बहुत बाकी है।। १ ॥

यूँ न मायूश होकर बैठ एक ठोकर पर ऐ राही।
राह में बिखरे काँटों के जाल बहुत बाकी है॥ २ ॥

वक़्त की परवाह न कर चलता जा मंजिल की ओर ।
दिन भी अभी बाकी है रात बहुत बाकी है॥ ३ ॥

अभी तो निकला है इस राह में थोड़ा सा दम।
जोश अभी बाकी है जज्बात बहुत बाकी है ॥ ४ ॥

मौत से पहले न छोड़ यूँ उम्मीद का दामन।
तुझमे अभी जिन्दा इंसान बहुत बाकी है॥ ५ ॥







"दीपक"

Thursday, January 28, 2010



"जरुरी तो नहीं"

इजहारे मोहब्बत में इकरार जरुरी तो नहीं।
हो उनको भी मुझसे प्यार जरुरी तो नहीं।
उठता है इन्कलाब जब याद उनकी आती है।
हो उनके दिल में भी सैलाब जरुरी तो नहीं ॥ १ ॥

आया है नभ में झूमता हुआ बादल ।
हो मेरे घर में भी बरसात जरुरी तो नहीं ॥ २ ॥

उनके गम को सीने से लगाये फिरता हूँ।
हो उनको भी मेरे दर्द का एहसास जरुरी तो नहीं॥ ३ ॥

बनकर शमां आग में उम्र भर जलता रहा है ये 'दीपक' ।
वो भी जलने आये बनकर परवाना ये जरुरी तो नहीं॥४॥









"दीपक "




प्रिय पाठकगण नमस्कार,

आज मै अपनी नविन कविता प्रकाशित कर रहा हूँ; आशा करता हूँ कि आप सब को पसंद आएगा।
कुछ पाठकगण ने शिकायत किया कि वो मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट नहीं लिख पाते। मै आप सभी को बताना चाहूँगा कि कमेन्ट लिखने के लिए कमेन्ट पर क्लिक करे और अपना कमेन्ट टाइप करे, उसके बाद निचे दिए गए आप्शन में से anonymous सेलेक्ट करे और send कर दे।


"दर्द"

मेरे अश्क मेरे दर्द का पैमाना है।
हम आशिकों का कही ठौर न ठिकाना है।
अंजाम बस इतना सा है मोहब्बत करने वालो का।
यादों की अग्नि है और उस आग में जल जाना है॥ १ ॥

लब्जो में बयां करना इश्क को आसान नहीं ।
खामोश लबों से इस राज को कह जाना है।। २॥

मिले जो कोई अपना तो मुस्कुरा देते है हम।
ख़ुशी की आड़ में हर गम को छुपाना है॥ ३ ॥

छलका है आंख के समंदर से एक बूँद अभी
दुःख की बदली है और बरसात का भी आना है॥ ४ ॥

इजहार हम अपनी मुहब्बत का कर न सके उनसे।
मासूम से ''दीपक'' का बस इतना सा फ़साना है॥ ५॥


 
 
"दीपक"