मेरी नवीन कविता । आशा है आप लोगो को पसन्द आएगी।
जब-जब वो रूख से नकाब हटाती रही।
इस जहाँ में कयामत जनाब आती रही ।।
ख़फ़ा जो हुईं वो इन गुश्ताख़ अँधेरों से ।
भरी तूफान में रात भर 'दीपक' जलाती रही ।।
चर्चे है पूरे शहर में इस कदर हमारे ईश्क की ।
सुनकर ये बात वो रात भर मुस्कुराती रही ।।
कुछ इस तरह से सिमटता गया यादों की आगोश में उनके ।
कि दिन भी गुजरता रहा, रात भी जाती रही ।।
कोशिशे सारी बेकार गयी, भूल जाने की उन्हे ।
जितना ही भुलाता रहा उतना ही याद आती रही । ।
~दीपक कुमार
जब-जब वो रूख से नकाब हटाती रही।
इस जहाँ में कयामत जनाब आती रही ।।
ख़फ़ा जो हुईं वो इन गुश्ताख़ अँधेरों से ।
भरी तूफान में रात भर 'दीपक' जलाती रही ।।
चर्चे है पूरे शहर में इस कदर हमारे ईश्क की ।
सुनकर ये बात वो रात भर मुस्कुराती रही ।।
कुछ इस तरह से सिमटता गया यादों की आगोश में उनके ।
कि दिन भी गुजरता रहा, रात भी जाती रही ।।
कोशिशे सारी बेकार गयी, भूल जाने की उन्हे ।
जितना ही भुलाता रहा उतना ही याद आती रही । ।
~दीपक कुमार