आज मैं अपनी प्रथम कविता प्रकाशित कर रहा हूँ | यह कविता मेरे कलम से उस समय उदघृत हुई थी जब मै अवसाद की स्तिथि से गुजर रहा था | वर्ष २००४ में किन्ही वजहों से मुझे अपनी अध्ययन को विराम देना पड़ा, ऐसे परिस्थिति में मै अवसाद का शिकार हो गया | मैंने साहित्य का मार्ग चुना और शीर्षक "मेरी प्रेमिका" नामक प्रथम कविता लिखी.
"मेरी प्रेमिका"
आइये आज आप को कुछ बतलाता हूँ,
आपको अपने जीवन की अविस्मरणीय घटना से अवगत कराता हूँ |
मेरा सुख और सुन्दर काया किसी को भा गई,
वह स्वयं को मेरी प्रेमिका बतला, मेरे ह्रदय में नही बल्कि मेरे मस्तिष्क के कोने में समां गई |
अब ना रातों को नीद ना दिन में भी चैन,
हर वक़्त रहता हूँ ग़मगीन, हर वक़्त बेचैन |
हंसना और गुनगुनाना पूर्ण रूपेण भूल गया,
इस कदर हुआ नकारा कि स्वयं के अस्तित्व को भी भूल गया |
यदि किसी महफ़िल और किसी भीड़ में भी जाता हूँ,
ना जाने क्यों स्वयं को अकेला ही खड़ा पाता हूँ |
तन्हाई का ये आलम था कि मित्र भी दूर रहने लगे,
स्वास्थ ने भी जबाब दे दिया और अलविदा कहने लगे |
बड़े दिनों के बाद इच्छा हुई की आईना देख लूँ ,
स्वयं पर गौर से एक नजर तो फेर लूँ |
आईना देख मै पूर्ण रूप से घबरा गया ,
आँखों तले मेरे अँधेरा छा गया |
मेरा चेहरा पूरी तरह से बदल गया है ,
मानो यौवन पर ग्रहण सा लग गया है |
मेरा सुख , मेरी सुन्दरता , मेरा लक्ष्य,
सब कुछ मुझसे छिन गया है |
अब मै बन गया हूँ पर्याय 'विनाश' का,
मेरे विनाश का कारण कोई और नही बल्कि है मेरी ही "प्रेमिका"
जी हाँ दोस्तों आप भी जान लीजिये चिंता है मेरी "प्रेमिका" |
"दीपक"