Thursday, July 3, 2014

अविरल , निश्छल , निर्मल, पावन 
बहती गंगा की धार हो तुम 
मेरे जीवन की आधार हो तुम 

रंग - रूप की प्रतिमा तुम 
कोमल,  सुंदर, तुम पावन हो 
मन है दर्पण, तन कंचन सा
तुम प्रेम की पहली सावन हों  

जो स्वप्न में थी मूरत मेरी 
उस मूरत की आकार हो तुम 
मेरे जीवन की  आधार हो तुम 

दीपक कुमार 

 

Monday, June 16, 2014

मेरी नवीन कविता । आशा है आप लोगो को पसन्द आएगी। 

जब-जब वो रूख से नकाब हटाती रही।
इस जहाँ में कयामत जनाब आती रही ।। 

ख़फ़ा जो हुईं वो इन गुश्ताख़ अँधेरों से । 
भरी तूफान में रात भर 'दीपक' जलाती रही ।। 

चर्चे है पूरे शहर में इस कदर हमारे ईश्क की । 
सुनकर ये बात वो रात भर मुस्कुराती रही ।। 

कुछ इस तरह से सिमटता गया यादों की आगोश में उनके ।
कि दिन भी गुजरता रहा, रात भी जाती रही ।।

कोशिशे सारी बेकार गयी, भूल जाने की उन्हे ।
जितना ही भुलाता रहा उतना ही याद आती रही । ।

~दीपक कुमार

Wednesday, May 8, 2013

आज सूनी शांम में अचानक तुम याद आ गई ;
जब वो नम रुमाल मेरे हाथ आ गई ।


वो नम रुमाल जो भीगा था तुम्हारे मोती समान अश्कों से ;
जब तुम रोई थी सिमट कर मेरी बाँहों में ।


उभर आया मेरे स्मरण पटल पर वो तुम्हारा मासूम सा चेहरा;


उन झील सी आँखों में वो सागर का उमड़ आना;
मोती समान अश्कों का गालों पर लुढ़क जाना ।


मानो सारा जहाँ सिमट गया जब तुम सिमटी थी मेरी बाँहों में;
छूता हूँ जब वो रुमाल तो तुम्हारी छुअन सी महसूस होती है ।


यकीन नहीं होता तुम स्वप्न हो या हकीकत ;
प्रेम की तरंग दैर्ध्य सी बहती हो मेरे ह्रदय के अनंत कोर में।


जीने की हसरत है वो तमाम क्षण
जिसमे सिर्फ तुम हो! तुम हो ! और सिर्फ तुम !!!

"दीपक कुमार "

Thursday, August 5, 2010

Meri Premika

आज मैं अपनी प्रथम कविता प्रकाशित कर रहा हूँ | यह कविता मेरे कलम से उस समय उदघृत हुई थी जब मै अवसाद की स्तिथि से गुजर रहा था | वर्ष २००४ में किन्ही वजहों से मुझे अपनी अध्ययन को विराम देना पड़ा, ऐसे परिस्थिति में मै अवसाद का शिकार हो गया | मैंने साहित्य का मार्ग चुना और शीर्षक "मेरी प्रेमिका" नामक प्रथम कविता लिखी.  


"मेरी प्रेमिका"

आइये आज आप को कुछ बतलाता हूँ, 
आपको अपने जीवन की अविस्मरणीय घटना से अवगत कराता हूँ |

मेरा सुख और सुन्दर काया किसी को भा गई,
वह स्वयं को मेरी प्रेमिका बतला, मेरे ह्रदय में नही बल्कि मेरे मस्तिष्क के कोने में समां गई |

अब ना रातों को नीद ना दिन में भी चैन,
हर वक़्त रहता हूँ ग़मगीन, हर वक़्त बेचैन |


हंसना और गुनगुनाना पूर्ण रूपेण भूल गया,
इस कदर हुआ नकारा कि स्वयं के अस्तित्व को भी भूल गया |

यदि किसी महफ़िल और किसी भीड़ में भी जाता हूँ,
ना जाने क्यों स्वयं को अकेला ही खड़ा पाता हूँ |

तन्हाई का ये आलम था कि मित्र भी दूर रहने लगे,
स्वास्थ ने भी जबाब दे दिया और अलविदा कहने लगे |

बड़े दिनों के बाद इच्छा हुई की आईना देख लूँ ,
स्वयं पर गौर से एक नजर तो फेर लूँ |

आईना देख मै पूर्ण रूप से घबरा गया ,
आँखों तले मेरे अँधेरा छा गया |

मेरा चेहरा पूरी तरह से बदल गया है ,
मानो यौवन  पर ग्रहण सा लग गया है |

मेरा सुख , मेरी सुन्दरता , मेरा लक्ष्य,
सब कुछ मुझसे छिन गया है |

अब मै बन गया हूँ पर्याय 'विनाश' का,
मेरे विनाश का कारण कोई और नही बल्कि है मेरी ही "प्रेमिका"
जी हाँ दोस्तों आप भी जान लीजिये चिंता है मेरी "प्रेमिका" |

"दीपक"

 
 

Tuesday, June 8, 2010

Armaan

"अरमान"
राह में उनकी हम अपने आँखें बिछाये बैठे हैं |
किसी संग दिल से हम मोहब्बत की आस लगाये बैठे हैं |
कोई तो संभालों इस दीवाने को ऐ यारों |
मोहब्बत की आग में हम अपना हाथ जलाये बैठे हैं || १ ||


जाने कैसे फंस गए हम इस इश्क के भंवर में |
तूफानी दरिया में हम चिराग जलाये बैठे हैं || २ ||

उन्हें इल्म भी नही है हमारे इस फसाने की |
हम उस बेमुर्रौवत से मोहब्बत की आस लगाये बैठे हैं || ३ ||

वो सोए है बेफिक्री की चादर में  ऐ 'जालिम'
हम उनके खाबों में अपने अरमान लुटाये बैठे है || ४ ||

"दीपक"







 

Monday, March 29, 2010

"प्रेम"
प्रेम एक रंग है, उमंग है, तरंग है,
कि प्रेम से ह्रदय में एक दीप जगमगाती है |
प्रेम से ही गीत बने, प्रेम से ही मीत बने, 
प्रेम से ही जीवन में प्रकाश चली आती है |
प्रेम में ना भूख लगे, प्रेम में ना प्यास लगे,
प्रेम हो तो अंखियो में नींद नही आती है |
और प्रेम हो तो मीरा जैसी कृष्ण की दीवानी बने,
रात-दिन प्रेम के ही गीत गुनगुनाती है |  


 




"दीपक"         

Friday, March 5, 2010

"हसरत "

ठहरो जरा थोडा सा इंतजार तो कर लो ,
मेरे  जितना खुद को बेक़रार तो कर लो  || १ ||  

यकीन न आयें मोहब्बत पे मेरी तो कोई बात नही ,
झूठा ही सही इस दीवाने पे ऐतबार तो कर लो  || २ ||

उठ रही है महफ़िल में हर नजर तेरी ओर,
दीद-ऐ -हसरत की तरफ नजर एक बार तो कर लो  || ३ ||


कौन जाने ये मुलाकात फिर हो ना हो,
आओ बैठो चंद हमसे कुछ बात तो कर लो || ४ ||


होता है दुवाओं में असर ये तो सच है,
हसरते पूरी होने की फ़रियाद तो कर लो || ५ ||


"दीपक"