Thursday, July 3, 2014

अविरल , निश्छल , निर्मल, पावन 
बहती गंगा की धार हो तुम 
मेरे जीवन की आधार हो तुम 

रंग - रूप की प्रतिमा तुम 
कोमल,  सुंदर, तुम पावन हो 
मन है दर्पण, तन कंचन सा
तुम प्रेम की पहली सावन हों  

जो स्वप्न में थी मूरत मेरी 
उस मूरत की आकार हो तुम 
मेरे जीवन की  आधार हो तुम 

दीपक कुमार 

 

Monday, June 16, 2014

मेरी नवीन कविता । आशा है आप लोगो को पसन्द आएगी। 

जब-जब वो रूख से नकाब हटाती रही।
इस जहाँ में कयामत जनाब आती रही ।। 

ख़फ़ा जो हुईं वो इन गुश्ताख़ अँधेरों से । 
भरी तूफान में रात भर 'दीपक' जलाती रही ।। 

चर्चे है पूरे शहर में इस कदर हमारे ईश्क की । 
सुनकर ये बात वो रात भर मुस्कुराती रही ।। 

कुछ इस तरह से सिमटता गया यादों की आगोश में उनके ।
कि दिन भी गुजरता रहा, रात भी जाती रही ।।

कोशिशे सारी बेकार गयी, भूल जाने की उन्हे ।
जितना ही भुलाता रहा उतना ही याद आती रही । ।

~दीपक कुमार