आज सूनी शांम में अचानक तुम याद आ गई ;
जब वो नम रुमाल मेरे हाथ आ गई ।
वो नम रुमाल जो भीगा था तुम्हारे मोती समान अश्कों से ;
जब तुम रोई थी सिमट कर मेरी बाँहों में ।
उभर आया मेरे स्मरण पटल पर वो तुम्हारा मासूम सा चेहरा;
उन झील सी आँखों में वो सागर का उमड़ आना;
मोती समान अश्कों का गालों पर लुढ़क जाना ।
मानो सारा जहाँ सिमट गया जब तुम सिमटी थी मेरी बाँहों में;
छूता हूँ जब वो रुमाल तो तुम्हारी छुअन सी महसूस होती है ।
यकीन नहीं होता तुम स्वप्न हो या हकीकत ;
प्रेम की तरंग दैर्ध्य सी बहती हो मेरे ह्रदय के अनंत कोर में।
जीने की हसरत है वो तमाम क्षण
जिसमे सिर्फ तुम हो! तुम हो ! और सिर्फ तुम !!!
"दीपक कुमार "
जब वो नम रुमाल मेरे हाथ आ गई ।
वो नम रुमाल जो भीगा था तुम्हारे मोती समान अश्कों से ;
जब तुम रोई थी सिमट कर मेरी बाँहों में ।
उभर आया मेरे स्मरण पटल पर वो तुम्हारा मासूम सा चेहरा;
उन झील सी आँखों में वो सागर का उमड़ आना;
मोती समान अश्कों का गालों पर लुढ़क जाना ।
मानो सारा जहाँ सिमट गया जब तुम सिमटी थी मेरी बाँहों में;
छूता हूँ जब वो रुमाल तो तुम्हारी छुअन सी महसूस होती है ।
यकीन नहीं होता तुम स्वप्न हो या हकीकत ;
प्रेम की तरंग दैर्ध्य सी बहती हो मेरे ह्रदय के अनंत कोर में।
जीने की हसरत है वो तमाम क्षण
जिसमे सिर्फ तुम हो! तुम हो ! और सिर्फ तुम !!!
"दीपक कुमार "