Wednesday, December 2, 2009

प्रिय पाठक,
कविता मन के भावनाओ का दर्पण होता है।
आज मै आप सभी के समक्ष अपनी प्रथम रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ /



'' वो अजनबी सा चेहरा''
कभी बागों के झूले, कभी सावन की बाहें।
कभी समंदर की लहरे, कभी हवा की सदाएं। 
हर वक़्त हर जगह, परेशान करती है मुझे। 
वो अजनबी सा चेहरा, वो घूरती सी निगाहें ॥ १ ॥  

तलाश करता हूँ मंदिरों और मस्जिदों में जिसे। 
ऑंखें बंद करता हूँ तो पलकों पे देखता हूँ उसे । 
मिन्नतें करती है खुदा से, और देती है मुझे दुआएं । 
वो अजनबी सा चेहरा, वो घूरती सी निगाहें ॥ २ ॥ 

  साथ अपने वो एक खुशनुमा बहार लाती है। 
उसके पायल के एक खनक ही मुझे जगा जाती है। 
घायल करने का इरादा, रखती है उसकी ये अदाएं। 
वो अजनबी सा चेहरा, वो घूरती सी निगाहें ॥ ३ ॥  

देखता आईना हूँ तो, सूरत उसकी दिखाई देती है। 
साँस मै लेता हूँ, धड़कन उसकी सुनाई देती है। 
खेल, 'आँख मिचौली' का खेल, हर घड़ी वो मुझे सताए। 
वो अजनबी सा चेहरा वो घूरती सी निगाहें ॥ ४ ॥


"दीपक"

2 comments:

  1. Very nice poetry bhaya.....................
    kabhi mereliye bhi potery likh diya karo na .............................

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  2. Ai dost, pada hai maine tere dard ko teri kavitaon me au dua hai meri ki tujhe teri chahat mil jaye. Genius Lage raho...............

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